हैदराबाद की एक पशु चिकित्सक को चार दरिंदों ने अपहृत किया, उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया और फिर उसे जिंदा जलाकर मार दिया। इस पर सारा देश गुस्से से उबल रहा था – अपने सांसद तक बोल रहे थे कि ऐसे दरिंदों को भीड़ के हवाले कर दिया जाना चाहिए, लोग मांग कर रहे थे कि इन्हें मृत पीड़िता की तरह जिंदा जला दिया जाना चाहिए और जितनी जल्दी हो सके उन्हें फांसी पर लटका दिया जाना चाहिए।

इसी बीच हैदराबाद पुलिस ने इन चारों दरिंदों को एंकाउंटर कर दिया। लोगों ने कहा – वास्तविक न्याय हो गया है। जब निर्भया की मां ने कहा कि वह पिछले सात साल से अपनी बेटी के साथ हुई दरिंदगी के लिए अभी तक न्याय पाने के लिए लड़ रही है, इधर-उधर भटक रही है और दरिंदों को फांसी पर लटकाये जाने की प्रतीक्षा कर रही है तो हैदराबाद में ऐसी ही घटना पर एंकाउंटर कर तुरंत न्याय दे दिया। आक्रोश से उबलते जो लोग महिला सुरक्षा को लेकर पुलिस को लगातार निशाने पर ले रहे थे वही लोग अब पुलिस की जय – जयकार कर रहे हैं।

केवल सामान्य लोग ही नहीं बल्कि मायावती जैसी सुप्रसिद्ध महिलाएं भी इस सही ठहरा रही हैं। हैदराबाद कांड के बाद एक से एक भयानक बलात्कार और हिंसा की खबरें लगातार आ रही है। उत्तर प्रदेश के कासगंज में सत्तरह साल की एक युवती को सामूहिक बलात्कार का शिकार बनाया गया। कानपुर में ग्यारहवीं की एक सोलह वर्षीय छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और बलात्कार करने वालों में एक डिग्रीधारी डॉक्टर भी शामिल है। आजमगढ़ में भी कुछ ऐसा ही हुआ। वहाँ तो महिला के शव से बलात्कार किया, उसकी नौ वर्षीय बच्ची को बलात्कार और अप्राकृतिक यौनाचार का शिकार बनाया। मैनपुरी में एक छात्रा के साथ बलात्कार किया गया और उसका शव पंखे से लटका दिया गया ताकि इसे आत्महत्या का मामला बताया जा सके। उन्नाव की एक बलात्कार पीड़िता को बलात्कारियों ने मिट्टी का तेल डालकर आग की लपटों के हवाले कर दिया। यह सब भारत में क्यों हो रहा है ? हमारी मानवीय चेतना को झकझोर रही है आक्रोश पैदा कर रही है। इनमें जो एक मांग सबके ऊपर सर उठाकर चल रही थी वह यही थी कि बलात्कारियों को जल्दी से जल्दी फांसी पर लटकाया जाये, मौत के घाट उतारा जाये।

हैदराबाद की पुलिस ने यही किया, चारों दरिंदों को मौत के घाट उतार दिया। अब इसे बलात्कार निषेधक एक प्रभावी कदम के रूप में स्थापित किया जा रहा है। सवाल यह है कि हैदराबाद पुलिस ने जिस तरह अपराधियों को बिना वकील, अदालत वांछित मृत्यु दंड दिया क्या उससे बलात्कारियों के मन में सचमुच कोई डर पैदा होगा? क्या यह नजीर बलात्कार और बलात्कार के बाद पीड़िता की हत्या करने या उसे जला डालने जैसी घटनाओं पर नियंत्रण लगाने या अपराधियों में भय जगाने में आंशिक तौर पर भी सफल होगी?

जिन्हें लग रहा है कि इससे बलात्कारियों के मन में भय पैदा होगा यह उनका सद्विचार हो सकता है, वस्तुस्थिति का यर्थाथपरक आकलन नहीं। बलात्कार ; वस्तुत: यौनेच्छा का हिंसक, आक्रामक और क्रूर विरेचन है। विश्व की सभी सामाजिक व्यवस्थाओं और धार्मिक व्यवस्थाओं ने अपनी अधिकांश नैतिकताओं का निर्माण मनुष्य की यौनेच्छा के विरुद्ध या शांत करने की ओर है। इसके दो प्रमुख तत्व सक्रिय रहे हैं वे हैं 1) बाह्य नियंत्रण और 2) आंतरिक नियंत्रण। 1) बाह्य नियंत्रण में कानून और दंड के प्रावधान हैं जो समाज सम्मत विधि की परिधि के बाहर जाकर किये गये यौनाचार को अवैध ठहराते हैं और दंडित करते हैं। 2) आंतरिक नियंत्रण में – सभी धार्मिक – सामाजिक व्यवस्थाएं व्यक्ति को संयम, नियंत्रण और यौनिक अनुशासन सिखलाती है।

कानूनी भय और धार्मिक आत्म – नियंत्रण एक सीमा तक तो कारगर रहती हैं उसके बाद नहीं। अगर भारतीय समाज की बात करें तो इसमें बाह्य नियंत्रण के प्रावधान, जिनमें पुलिस – प्रशासन – न्यायालय आदि की प्रक्रियाएं शामिल हैं, बहुत कमजोर हैं। दूसरी ओर, आधुनिकता वादी जीवन शैली ने आत्म – नियंत्रण की धारणा की खोखला कर दी हैं। मनुष्य स्वयं, स्वयं को एक्स्पोसर (दिखावा) करने लगा है। ऐसे में मनुष्य जो मूलत: पशु है और बार – बार अपनी यौनेच्छा की तुष्टि के लिए उन तमाम रास्तों की तलाश करता है जो समाज और कानून विरोधी होते हुए भी उसे विरेचन का सुख देते हैं और बलात्कार इनका सबसे हिंसक रूप है।

यौनेच्छा मनुष्य निर्मित अप्राकृतिक प्रावधानों से सदैव नियंत्रित नहीं होती इसलिए जब भी इसे अवसर मिलता है तो यह अपने विकृत रूप में फूट पड़ती है। हर व्यक्ति की यौनेच्छा के स्वाभाविक विरेचन का कोई भी समाज सम्मत उपाय हमारे पास नहीं है। अगर ऐसा उपाय खोज भी लें तो भी मनुष्य निर्मित कोई भी व्यवस्था ऐसी नहीं होती जो अचूक हो और हर विकृत व्यवहार पर लगाम लगा सके। फिर भी कहावत है “भय से भूत भी भागता है”। एंकाउंटर का असर तो पड़ेगा ही।

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