गृहमंत्री अमित शाऔर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी दोनों ने लोक सभा एवं राज्य सभा दोनों में सभी प्रकार की आशंकाओं का निवारण करने की कोशिश की है। दोनों ने साफ किया है कि यह विधेयक केवल पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिंक उत्पीड़न के कारण भागकर आए हिन्दुओं, सिखों, बौद्धों, जैनों, पारसियों और ईसाइयों को नागरिकता देने के लिए है। इसमें किसी की नागरिकता का निषेध नहीं है। फिर भी इतना हिंसक विरोध बताता है कि इसके विरुद्ध दुष्प्रचार किया गया है।

इससे भारत के मुसलमानों का कोई लेना – देना नहीं है। बावजूद उन्हें भड़काकर राजधानी दिल्ली से लेकर अनेक राज्यों में उग्र हिंसक प्रदशर्न कराए जा रहे हैं। हां, पूर्वोत्तर के लोगों की आशंकाएं थीं पर गृहमंत्री ने बताया कि उन्होंने पूर्वोत्तर के राजनीतिक नेताओं, सांसदों, विधायकों, गैर राजनीतिक संगठनों, एनजीओ, सामाजिक संगठनों, छात्र संगठनों सबसे 150 घंटे से ज्यादा र्चचा कर उनकी आशंकाओं का निवारण किया और उनके सुझाव के अनुसार विधेयक में संशोधन भी किया।

इसके पीछे वही तत्व हैं, जो गलतफहमी पैदा कर अस्थिरता उत्पन्न करना चाहते हैं। देश भर में इस कानून को मुसलमानों का खलनायक मानने वाले ध्यान रखें कि सिक्किम को छोड़कर पूर्वोत्तर के ज्यादातर सांसदों ने विधेयक के पक्ष में मतदान किया। मणिपुर को इनरलाइन परमिट (आईएलपी) के तहत लाने की घोषणा के बाद पूर्वोत्तर के तीन राज्य अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और मणिपुर पूरी तरह से नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 के दायरे से बाहर हो गए। शेष तीन राज्य – नागालैंड (दीमापुर को छोड़कर जहां आईएलपी लागू नहीं है), मेघालय (शिलांग को छोड़कर) और त्रिपुरा (गैर आदिवासी इलाकों को छोड़कर जो संविधान की छठी अनुसूची में शामिल नहीं हैं) को प्रावधानों से छूट दी गई थी। दीमापुर को भी इसमें शामिल कर दिया गया है। तो फिर विरोध का औचित्य क्या है?

बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन, 1873 के तहत सीमाई इलाकों के लिए “इनर लाइन ऑफ परमिट” लागू किया गया था। इसके तहत बाहर के लोगों को (भारतीयों को भी) आईएलपी के जरिए ही प्रवेश की अनुमति दी जाती है। बाहरी लोग आईएलपी इलाकों में सीमित समय के लिए रह सकते हैं, लेकिन वहां अचल संपत्ति नहीं खरीद सकते। इस व्यवस्था के कारण ही ज्यादातर राज्यों ने आंदोलन से अपने को अलग कर लिया।

त्रिपुरा में भी मामला लगभग शांत हो गया। किंतु असम धू-धू कर जल रहा था। सेना के मोर्चा संभालने से स्थिति सुधरी है। असम में बराक घाटी के तीन जिलों में 1.5 लाख बंगाली हिन्दू शरणार्थी रहते हैं। घाटी के कछार, करीमगंज और हैलाकांडी जिले में रहने वाले शरणार्थी इस संशोधन से लाभान्वित होने वाले सबसे बड़े समूह होंगे। असम में यह आशंका पैदा की गई है कि कानून बदलने के बाद बांग्लादेश से आए हिन्दुओं को नागरिकता मिल जाएगी और तब ये बांग्लादेशी हिन्दू उनके (असम के मूल निवासियों के) हितों को चुनौती देंगे। इन बांग्लादेशी हिन्दुओं के कारण उनकी संस्कृति, भाषा, परंपरा, रीति-रिवाजों पर असर पड़ेगा। विरोधियों का कहना है कि असम ने 1951 से 1971 तक आए शरणार्थियों का बोझ उठाया, शरणार्थियों का अब और बोझ नहीं उठा सकता।

सरकार आम लोगों के अंदर गलतफहमी दूर करने का प्रयास करे। उन्हें विश्वास में ले। लेकिन जो इसका गलत लाभ उठाने के लिए हिंसा और सांप्रदायिकता फैला रहे हैं, उनकी पहचान कर सख्ती से पेश आने की आवश्यकता है। आखिर कई जगह मुसलमान कह रहे हैं कि मोदी ने मुसलमानों को बाहर निकालने का कानून बनाया है। यह झूठ किसने फैलाया है? इसकी जांच होनी चाहिए।

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